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ऑनलाइन कबाड़ीवाला

आम तौर पर लोग बने बनाए रास्तों पर चलते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो ना केवल अपने लिए नया रास्ता बनाते हैं बल्कि उस रास्ते से और भी कई लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं। अनुराग असाटी ऐसे ही युवा हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके अनुराग आज ना केवल एक सफल कारोबारी हैं बल्कि समाज की बेहतरी के कई प्रयासों से भी जुड़े हैं। उनका कारोबार भी ना केवल रेवेन्यू और रोज़गार पैदा कर रहा है बल्कि देश को एक बड़ी समस्या से मुक्ति दिलाने का भी बड़ी कोशिश है। अनुराग कबाड़ यानी वेस्ट मैनेजमेंट का काम कर रहे हैं। अनुराग ऑनलाइन कबाड़ीवाला हैं।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई-कबाड़ से कमाई

दमोह के रहने वाले अनुराग असाटी भोपाल में इंजीनियरिंग कर रहे थे। पढ़ाई का अंतिम वर्ष था।  एक दिन घर का कबाड़ और कुछ पुराने पेपर बेचने के लिए अनुराग कबाड़ीवाले का इंतज़ार कर रहे थे। देर तक जब कबाड़ीवाला नहीं आया तो बाहर निकल कर खोजने की कोशिश की कि कोई कबाड़ीवाला मिल जाए जिसे वो अपनी रद्दी और कबाड़ बेच दें। उस दिन अनुराग को कबाड़ीवाला तो नहीं मिला लेकिन एक ऐसा आइडिया मिला जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी।

कबाड़ीवाले का ना मिलना अनुराग के दिमाग में हलचल मचाने लगा। उन्हें ये एक ऐसी समस्या लगी जिससे हर घरवाला झेल रहा है। अनुराग  इसका हल ढूंढने में लग गए। इंजीनियर ने अपना दिमाग दौड़ाया और तय कर लिया कि अब वो ख़ुद ही कबाड़ का काम करेंगे। उन्होंने अपने एक सीनियर कवीन्द्र रघुवंशी के साथ मिलकर “कबाड़ीवाला ”  के नाम से स्टार्टअप की शुरुआत कर डाली।

शुरुआत के साथ ही मुश्किलों से सामना

एक सोच को साकार करने में सैकड़ों मुश्किलें आती हैं। अनुराग का भी इन मुश्किलों से सामना हुआ। साल 2013 में उन्होंने एक ऐप बनाया। काम की ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई कि इंजीनियरिंग के बाद नौकरी का दबाव पड़ने लगा। उन्होंने नौकरी भी की लेकिन अपना काम शुरू करने का ख़्याल मन से कभी गया नहीं। और फ़िर साल 2015 में नौकरी छोड़कर अपना काम करने का फ़ैसला कर लिया। लेकिन इसमें भी घरवालों को मनाना अनुराग के लिए काफ़ी परेशान करने वाला रहा। वो बताते हैं कि ‘कई लोग मेरे पिता से पूछते थे कि यह क्या कबाड़ का काम कर रहा है आपका बेटा ? तब वो कोई जवाब नहीं दे पाते थे। लेकिन जब मेरे पिता ने देखा कि हम कुछ हटकर कर रहे हैं और बड़े स्तर पर काम करना चाहते हैं, तो उन्होंने मेरा साथ दिया। हमारे  शुरुआती निवेशकों में वो भी शामिल हैं।‘ काम की शुरुआत के बाद भी कई लोगों ने इसे छोड़ फ़िर से नौकरी करने की सलाह भी दी, लेकिन अनुराग अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे। वो चुनौतियों से निपटना चाहते थे, उनकी  सीख से आगे बढ़ना चाहते थे। 

कबाड़ीवाला ने ख़रीदी कबाड़ की बाइक

अनुराग ने कबाड़ीवाला का काम शुरू कर दिया था। उन्होंने इसकी शुरुआत अपने एक जूनियर की कबाड़ हो चुकी बाइक को ख़रीद कर की। अनुराग बताते हैं कि ‘तब हमारे पास कोई टीम नहीं थी, इसलिए मैं अपने दोस्त के साथ ही बाइक पर  कबाड़ लेने चला गया।  उस समय मुझे पता भी नहीं था कि कबाड़ को कैसे लाया जाता है , किस कबाड़ को कहा देना है।  कबाड़ को छांटना और बेचना उनके लिए बड़ी चुनौती का काम था।

वो बताते हैं कि ‘यह कारोबार इतना अव्यवस्थित  है कि इसमें कोई सिखाने वाला शायद  ही कोई मिलता है। शुरुआत में हमने कई ग़लतियां कीं और उन्हीं ग़लतियों से हमने बहुत कुछ सीखा भी। दूसरी समस्या लोगों के व्यवहार को बदलने की है। ज़्यादातर लोग कबाड़ीवाले को इज़्ज़त नहीं देते। न ही उनके काम को सम्मान मिलता है। लेकिन हमने प्रोफेशनल टीम बनाई। लोगों को कबाड़ को अलग-अलग जमा करने के बारे में बताया, जिससे उनमें जागरूकता भी आई और उनका हमारे प्रति नज़रिया भी बदला।’

 

कबाड़ मैनेजमेंट के गुर

अनुराग ने एक ऐसा सेटअप तैयार किया है जिसमें उनकी कंपनी कबाड़ीवाला अलग-अलग शहरों से, चालीस से भी ज़्यादा तरह के कबाड़ इकट्ठा करने का काम करती है। इस कबाड़ को देश की कई रीसायक्लिंग कम्पनियों के पास भेजा जाता है। इस समय  क़रीब तेईस प्रतिशत मेटल वेस्ट ही रीसायकल किया जा रहा है, जबकि सतहत्तर प्रतिशत लैंडफिल में जाता है। अनुराग कबाड़ीवाला के ज़रिए एक ऐसे चेन सिस्टम को डेवलप कर रहे हैं जिसके ज़रिए रिसाइकल होने वाले वेस्ट मैटेरियल का प्रतिशत बढ़ाया जा सके। इससे लैंडफिल पर बोझ कम होगा और नए उत्पाद में कच्चे माल की ज़रूरत भी कम लगेगी यानी प्राकृतिक संसाधनों की भी बचत हो पाएगी।

सरकार और कंपनियों के तालमेल

‘कबाड़ीवाला’ का काम बढ़ा तो लोग इसके मुरीद भी होते चले गए। सरकार से लेकर कई कंपनियों ने ‘कबाड़ीवाला’ के साथ काम करना शुरू किया। ‘कबाड़ीवाला’ भोपाल नगरपालिका के सूखे कचरे जैसे क़ागज़, प्लास्टिक, मेटल, ई-वेस्ट को रीसायक्लिंग के लिए भेजते हैं। पाँच शहरों की पाँच सौ से ज़्यादा बड़ी कम्पनियों और स्टोर्स से भी कबाड़ इकट्ठा किये जाते हैं।  रेस्टोरेंट की कई बड़ी चेन, ऑफ़िस और बैंको से भी ‘कबाड़ीवाला’ वेस्ट जमा करती हैं। ‘कबाड़ीवाला’ फ़िलहाल सौ से ज़्यादा रीसायक्लिंग कम्पनियों के साथ मिलकर काम कर रही है। रीसायकल करने के अलावा, लोगों में जागरूकता लाने और उनके वेस्ट को अलग करने तक का सारा काम कम्पनी करती है। चूंकि उनका सारा काम ऑनलाइन है। इसलिए सभी तरह के कबाड़ का सही दाम और ऑनलाइन पिकअप सर्विस सबकुछ ग्राहकों को पहले से ही पता चल जाता है।   

कबाड़ की दिलचस्प जानकारी

‘कबाड़ीवाला’ कबाड़ के सिर्फ़ पैसे ही नहीं देता, बल्कि इससे जुड़ी हर जानकारी अपने ग्राहकों को देता है जो उनके काम को और भी ख़ास बनाता है। उन्होंने अपने इस काम को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा है। कंपनी अपने हर एक ग्राहक का ट्रैक रिकार्ड रखती है। किसने कितना कबाड़ बेचा, क्या बेचा? इसके जरिए उन्होंने कितने पेड़ कटने से बचाए ? उनके इस प्रयास से पर्यावरण को कितना फ़ायदा होगा ? ‘कबाड़ीवाला’ उन्हें एक सर्टिफिकेट भी भेजता है कि उनके प्रयास से लैंडफ़िल में कितना कचरा जाने से बच गया।

बुलंदियों के आसमान पर अनुभव

अनुभव और उनके साथियों की मेहनत रंग लाई और कंपनी अब काफ़ी विस्तार ले चुकी है। साल 2019 में  कम्पनी को तीन करोड़ रुपये का निवेश भी मिला जिससे काम को आगे बढ़ाने में मदद मिली।  

एक समय साल का चार से पाँच लाख ही सालाना टर्नओवर बना पाने वाली कंपनी ‘कबाड़ीवाला’ अब दस करोड़ रुपयों के सालाना टर्नओवर को पार कर चुकी है। भोपाल ही नहीं लखनऊ और कानपुर से भी कबाड़ लेने का काम शुरू हो गया है। कंपनी आने वाले दिनों में अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे और मुंबई सहित कई और शहरों में भी अपने काम को बढ़ाने वाली है।

समाज के लिए बड़ी सीख

‘कबाड़ीवाला’ ना केवल कारोबार में जुटा है बल्कि वो एक बेहतर समाज के निर्माण में बड़ी भूमिका भी अदा कर रहा है। अनुभव और टीम से जुड़े लोग अक्सर वर्कशॉप और स्वच्छता अभियान में शिरकत करते हैं। लोगों को कचरे और कबाड़ से होने वाले नुकसान समझाते हैं। कबाड़ की चीज़ों के इस्तेमाल की जानकारी देते हैं। बच्चों को इनसे कुछ क्रियेटिव बनाना सिखाते हैं। अनुभव को अपने स्टार्ट अप और अपने कामों के लिए कई सम्मान भी मिल चुके हैं।

‘कबाड़ीवाला’ की पूरी टीम को इंडिया स्टोरी प्रोजेक्ट की शुभकामनाएं।

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